वह जमाना चला गया
एस ए डांगे
[श्री एस. ए. डांगे, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के संस्थापक विश्व के सबसे अधिक वयोवृद्ध कम्यूनिस्ट नेता, आल इन्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के भू.पू. अध्यक्ष, भूतपूर्व सांसद, स्वतन्त्रता सेनानी, मार्क्सवादी विचारक तथा लेखक, संस्कृत विद्वान।
नित्यनूतन के विशेष संवादाता बम्बई जाकर श्री डांगे से मिले । 1977 की कांग्रेस की हार के बाद, दिल्ली में हुई पहली आम सभा में मंच पर इन्दिरा जी के साथ बैठे थे एक ही नेता, श्री डांगे । उसी समय की एक तस्वीर दीवार पर टंगी थी। छियासी साल की उम्र में भी श्री डांगे की पैनी बुद्धिमत्ता, विनोदप्रियता तथा बातचीत का सहज ढंग किसी को भी प्रभावित किये बगैर नहीं रह सकता, प्रस्तुत हैं उसी भेंट वार्ता के कुछ अंश ]
नित्यनूतन संवादाता - सुना हैं कि 'इन्दिरा जी बम्बई में इसी मकान में आपसे दो तीन बार मिलने आयी थीं । इन्दिराजी से आपका वर्षों का परिचय है आप उनसे सबसे पहले कब मिले थे ?
डांगे- पण्डित नेहरू जब प्रधानमन्त्री थे, तब उनसे मिलने मैं तीन मूर्ति कभी-कभी जाता था। उस समय इन्दिरा जी हमारी बातचीत में सम्मिलित नहीं होती थी । पंडित जी ने चाय-मंगवाई तो भेज दिया करती थीं। उनसे मिलना अधिक हुआ उनके प्रधानमंत्री बनने पर। उस समय मैं संसद सदस्य था। बंगलादेश के बनने पर उन्हीं को बताकर मैं ढाका गया था। मुजीब साहब तथा वहां के कम्युनिस्ट नेताओं से मिला। लड़ाई से पहले एक बार जयप्रकाश जी मुझसे मिले और उन्होंने कहा कि इन्दिराजी से कहिये कि पूर्व पाकिस्तान में अपनी फौज भेजे। मैंने जवाब दिया कि मैं कुछ नहीं कहूंगा। वे ठीक समय पर ठीक निर्णय लेंगी। उनके सलाहकार की भूमिका अपनाना मुझे मंजूर नहीं है। क्योंकि मेरा विश्वास है कि वे बिल्कुल सही निर्णय लेंगी।
नि. सं. - नेहरू जी और इन्दिरा जी की तुलना की जाये तो क्या नजर आयेगा ?
डांगे- नेहरू जी का जमाना अलग था इन्दिरा जी का जमाना बिल्कुल अलग। हां यह लड़की ज्यादा जिद्दी जरूर थी वे सोवियत यूनियन के नेताओं को कई बार ऐसी खरी- खरी सुनाने वाली पत्र लिखती जिनके वे आदी नहीं थे। एक बार मैंने उनके एक नेता से हंसते हुए कहा, आप प्रोटेस्ट (निषेध) क्यों नहीं करते ? तो वे बोले उससे क्या लाभ होगा ? वह कभी किसी की सुनती थोड़े ही हैं । सोवियत यूनियन में पण्डित जी का बहुत असर था। अपनी सोवियत यूनियन की यात्रा समाप्त कर भारत लौटते समय पण्डित जी ने कहा था मैं अपने दिल का एक टुकड़ा यहां छोड़कर जा रहा हूं इसका वहां पर गहरा असर हुआ । पण्डित जी केवल राजनीतिझ नहीं थे कवि भी थे । पर इन्दिरा जी का सोवियत यूनियन पर डबल प्रभाव था क्योंकि वे थीं महिला ।
श्री डांगे जी के साथ सभी हंस पड़े, डांगे जी आगे बोले, जिस तरह उस देश की आम जनता इन्दिरा जी के दर्शन के लिए उमड़ पड़ती थी वह अब शायद ही किसी को नसीब होगा । दैट एज इज गान, वह जमाना अब चला गया।
नि. स.- उन दोनों में कौन-सी ऐसी बात थी, जिससे कि लोग उनकी ओर आकर्षित होते थे ?
डांगे- उनके शासन में पाइगनुर आप्रेशन (दर्दनाक दमन) कभी नहीं रहा । वैसे सभी बुर्जुवा देशों में भ्रष्टाचार रहता ही है तो यहां पर भी है । लेकिन वे दोनों स्वयं भ्रष्टाचारी कतई नहीं थे। बात ऐसी है कि इस देश को चाहिए जवाहरलाल नेहरू इन्दिरा गांधी । यह देश उनका आदी बन गया था । उन दोनों में कुछ ऐसी बात थी समथिंग अन्डिफाइन्ड [ कुछ ऐसा जिसकी परिभाषा नहीं की जा सकती ] जिसका इस देश पर गहरा असर हुआ। वैसे यह लड़का (राजीव गांधी) भी ठीक चल रहा है। धीरे-धीरे वह उस देश की समस्याओं को समझेगा |
नि. स. - इन्दिरा जी की सफलता क्या थी ?
डांगे – उसके एडिमिनेस्ट्रेशन (प्रशासन) पर उसका पर्सनल कलर (व्यक्तिगत रंग) चढ़ा था। वे लिवरल (उदार) जनरस (दरिया दिल ) थीं और महिला भी । एक महिला का भारत जैसे विशाल देश की प्रधानमंत्री बनना एक अनोखी अद्भुत चीज थी, जिसका रंग सब पर चढ़ा था। अब यही देखो कि अभी तक हमारे देश में महारानी विक्टोरिया की बात सुनायी जाती हैं, अडेव या जार्ज का कोई जिक्र नहीं करता। उसी तरह आगे आने वाली पीढ़ियां इन्दिरा गांधी की बातें सुनाया करेगें और किसी की नहीं हां एक अपवाद रहेगा पंडित की स्वयं ।
इन्दिरा के चेलों ने और साथियों ने गड़बड़ की और 1977 की हार हुई। जिस कारण देश को बहुत कीमत चुकानी पड़ी अगर इन्दिरा बनी रहती तो खूब जोरदार हमला करती पुरानी समाज व्यवस्था पर एक बार उन्होंने मुझसे भूमि सुधार के बारे में पूछा था । मैंने कहा 'यू आर लिब्रेटिंग लैण्ड लेस लेबर (आप भूमि हीन मज़दूरों को बन्धनों से मुक्ति दिला रही हैं ।) लेकिन यह काम बनना सम्भव नहीं दिखता, क्योंकि जमींदार वर्ग आज भी बहुत प्रभावशाली है। आप अभी तक उनके पंख काट नहीं पाई हैं, जिन बन्धुआ मजदूरों को आप मुक्ति दिला रहीं हैं उनके लिये काम देने का इंतज़ाम नहीं किया गया है । बात ऐसी है हमारी आजादी के बाद अमेरिका ब्रिटेन की जगह लेना चाहता था और हमारी ब्यूरोक्रेसी ( अफसर शाही) भी हावी है हम पर । लेकिन इन्दिरा जी ने उनका प्रभाव कम किया था। भारत की असली शान दोनों बाप-बेटी के जमाने में रही । अब चिंता लगी रहती है कि इन्दिरा के जाने के बाद कहीं सभी क्षेत्रों में प्रगतिशील दिशा की रफ्तार कम न पड़ जाए ।
नि. सं. - इंदिरा जी १९७७ में क्यों हारीं ?
डांगे – इलेक्शन इज ए ट्रिक, इट इज नाट ने वेसरिली मेजर (चुनाव एक तरकीब है, उसे हमेशा एक पैमाना नहीं माना जा सकता) एकाध परसेंट से भी कोई हार सकता है ।---......उस समय इन्दिरा जी की लोकप्रियता समाप्त नहीं हुई थी कुछ कम हुई थी उनके चेलों ने उन्हें धोखा दिया । जयप्रकाश नारायण के द्वारा रचे गए षड़यन्त्र का इन्दिरा जी ने पर्दाफाश क्रिया । पर इन्दिरा जी के अपने ही अनुयायी उनके लिये समस्या बन गये, जो उनकी हार के लिए जिम्मेदार हैं।
नि. सं. - 1980 में इन्दिरा जी फिर से सत्ता में कैसे आ सकीं ?
डांगे - लोगों के सामने दूसरा अच्छा कोई पर्याय ही नहीं था। (हंसते हुए) उन्होंने देखा कि सारे मर्द बेकार साबित हुए। यह महिला ही सबसे अच्छी है । वैसे भारत का इतिहास भी इस बात का साक्षी है कि उसी तरह पुरुषों की लाइन को अस्वीकार कर महिलाओं के शासन को स्वीकार, कई बार किया गया है। चाहे महिला राजगद्दी पर बैठे या न बैठे, शासन उसी का चला है भारत की महिलायें पुरुषों से अधिक बुद्धिमान और सक्षम रही हैं। मराठों के इतिहास में शिवाजों की माता जीजाबाई बहुत अच्छे ढंग से शासन चलाती रही। उसका एक अलग आसन था। जहाँ से न्याय दिया करती थी। भारत के इतिहास की उस परम्परा का सर्वोतम रूप इन्दिराजी में निखर उठा । आज तक के इतिहास में न कभी इतना विशाल देश एक शासक के अन्त गत रहा न कभी इतना विराट् जनसमूह एक साथ रहा।
इन्दिरा जी बातें सबकी सुनती थी पर दिमाग उनका अपना ही चलता था वे इतनी उदार थीं कि और सबके साथ अच्छा व्यवहार रखती थी कि ऐसा सत्ताधीश अब नहीं मिलेगा उन्होंने जीवनभर अच्छी शिक्षा पायी, गांधी जी के साथ, पन्डित जी के साथ अन्य सभी बड़े नेताओं के साथ रहने का उन्हें अवसर मिला। इतनी बड़ी हुकूमत उनके हाथ में थी पर उन्होंने सन्तुलन कभी खोया नहीं। पण्डित जी के साथ भी यही बात थी। मोतीलाल जी के हाथ में सत्ता नहीं थी पर वे उस समय भी शान से रहते थे । लगता था जैसे हुकूमत उन्हीं के हाथ में हो । अंग्रेज गर्वनर उनके साथ हमेशा मित्रता का सलूक करता रहा । उन सभी में एक अजीब-सा गुणों का समिश्रण था ।
नि. सं. - क्या इन्दिरा जी की हत्या को रोकना सम्भव था ?
डांगे - अमेरिका का उसमें हाथ था, उसके बिना किसी प्रधानमन्त्री की हत्या होना सम्भव ही नहीं है । अमेरिका को लगा कि अब यह महिला बहुत ज्यादा शक्तिशाली बन रही हैं जो उनके लिये भारी पड़ रहा था । अमरीका चाहता था कि उसका वजन बढ़े। पर इंदिराजी ने बढ़ने नहीं देती। दोनों महाशक्तियां चाहती थीं कि अपना वजन बढ़ें पर इन्दिरा जी बताया कि भारत कोई छोटा देश नहीं है यह महान देश है। इन्दिरा जी थी धर्मनिरपेक्ष, तो सम्प्रदायवादी सिखों को उनकी लाइन कैसे जंचती ? सवाल धर्म या सम्प्रदाय का नहीं था अन्तरराष्ट्रय राजनीत का था ।
नि.स. - चीन भारत युद्ध के समय क्या नेहरू जी से आपकी भूमिका भिन्न थी ?
डांगे- उस समय कई नेताओं ने पन्डित जी से कहा कि कम्यूनिस्ट पार्टी को गैर कानूनी करार दिया जाए । सभी कम्यूनिस्टों को गिरफ्तार किया जाय। मैं उस समय कलकत्ते में था। हमारी पार्टी ने तब तक लड़ाई के बारे में कोई निर्णय नहीं लिया था । दिल्ली लौटने पर मैंने पार्टी क बैठक बुलायी । पन्डित जी पर काफी दबाव सा आ रहा था । लेकिन उन्होंने कहा 'लेट अस वेट एण्ड सी व्हाट हैपन्स टू डागेंज लाइन' [हम जहा प्रतीक्षा करें और देखें कि डांगे की लाइन मानी जाती है या नहीं ] उन्हीं दिनों में मैंने उनसे कहा कि मैं सोवियत यूनियन जाना चाहता हूं । उन्होंने कहा ठीक है जाइये । मैंने पूछा कि वहां पर क्या किया जाए तो उन्होंने कहा कि वे तटस्थ रहें तो भी काफी है । उस समय उनके लिए और हमारी पार्टी के लिये भी कभी उलझन थी । सोवियत यूनियन जाने पर मुझे पता चला कि वे केवल तटस्थ नहीं रहे, बल्कि उन्होंने कई ऐसे काम किये जिससे भारत की सहायता हुई ।
पन्डित जी और इन्दिरा जी के लिए मेरी एक व्यक्तिगत भावना रही है । बिना बुलाये मैं कभी उनसे मिलने नहीं जाता था और न सलाह देता था । मेरा विश्वास था कि साधारणतया वे जो भी करेंगे, ठीक ही करेंगे । जब डांगे जी से पूछा गया कि आप दिल्ली कब आ रहे हैं तो उन्होंने दर्द भरी आवाज में कहा, ‘अब किससे मिलने दिल्ली आऊं ?'